तुम स्वयं इतने ज्ञानी
न्याय दर्शन के
आदि प्रवर्तक
मन्त्र द्रष्टा ,
मन्त्र रचयिता ,
तुमने मुझे उस अपराध के लिए
शाप दिया
जो मैंने किया ही नहीं था ...
जब ज्ञानी होकर भी
तुम नहीं जान पाए कि
रात कितनी बाकी है
आकाश में तारों की स्थिति क्या है
और छद्म आवाज ही सुन कर निकल पड़े
मुझे कैसे ज्ञात हो सकता था ..
और जब तुमने देखा ही
कि ,तुम्हारे ही वेश में कोई था ,
तब क्या सोचकर मुझे शापित किया
पाषण शिला हो जाने के लिए !
क्या एक बार भी सोचा
क्या अन्याय करने जा रहे हो मेरे साथ
एक न्याय द्रष्टा के
अन्याय का लक्ष्य ,
मैं क्यों बन गयी अयाचित .
चरित्र ,कर्म एवं पुण्य द्वारा
प्राप्त पद एवं
पौरुष का दुरुपयोग तो
इंद्र ने किया ,
सूर्य और चन्द्र जैसे देवता जो
सर्वदा पूजित हैं
इस अघोर कृत्य के सहायक बने
तो मेरा पाप क्या था !
सिर्फ तुम्हारी पत्नी होना ही ना !
स्वयं के साथ हुए छल से उपजे
मानसिक संताप ,दुःख ,वेदना पर
सांत्वना देने की जगह ,
दे दिया तुमने
पाषाण शिला होने का शाप
मुझे तुम्हारे शाप का
उतना दुःख नहीं हुआ
उससे कहीं ज्यादा दुःख
उस अविश्वास का हुआ
जो तुमने किया .
अपनी नियति मान पड़ी रही मैं भी
अनंत काल तक ...
कभी तो दशरथ पुत्र के वेश में
हरि आयेंगे ..
और उनका चरण -स्पर्श
दे जायेगा मुक्ति
पाषाण -स्थिति से भी
और
जन्म -मरण के चक्र से भी ...विजय
न्याय दर्शन के
आदि प्रवर्तक
मन्त्र द्रष्टा ,
मन्त्र रचयिता ,
तुमने मुझे उस अपराध के लिए
शाप दिया
जो मैंने किया ही नहीं था ...
जब ज्ञानी होकर भी
तुम नहीं जान पाए कि
रात कितनी बाकी है
आकाश में तारों की स्थिति क्या है
और छद्म आवाज ही सुन कर निकल पड़े
मुझे कैसे ज्ञात हो सकता था ..
और जब तुमने देखा ही
कि ,तुम्हारे ही वेश में कोई था ,
तब क्या सोचकर मुझे शापित किया
पाषण शिला हो जाने के लिए !
क्या एक बार भी सोचा
क्या अन्याय करने जा रहे हो मेरे साथ
एक न्याय द्रष्टा के
अन्याय का लक्ष्य ,
मैं क्यों बन गयी अयाचित .
चरित्र ,कर्म एवं पुण्य द्वारा
प्राप्त पद एवं
पौरुष का दुरुपयोग तो
इंद्र ने किया ,
सूर्य और चन्द्र जैसे देवता जो
सर्वदा पूजित हैं
इस अघोर कृत्य के सहायक बने
तो मेरा पाप क्या था !
सिर्फ तुम्हारी पत्नी होना ही ना !
स्वयं के साथ हुए छल से उपजे
मानसिक संताप ,दुःख ,वेदना पर
सांत्वना देने की जगह ,
दे दिया तुमने
पाषाण शिला होने का शाप
मुझे तुम्हारे शाप का
उतना दुःख नहीं हुआ
उससे कहीं ज्यादा दुःख
उस अविश्वास का हुआ
जो तुमने किया .
अपनी नियति मान पड़ी रही मैं भी
अनंत काल तक ...
कभी तो दशरथ पुत्र के वेश में
हरि आयेंगे ..
और उनका चरण -स्पर्श
दे जायेगा मुक्ति
पाषाण -स्थिति से भी
और
जन्म -मरण के चक्र से भी ...विजय