Saturday, 22 June 2013

रश्मि -रथी

रश्मि रथी !
आखिर आ ही गए ना।।
तुम्हारी अभ्यर्थना में 
खोल दिए द्वार 
मन -प्राण के 
ज्ञात है मुझे भी 
तुम्हारी किरणे
पड़ती हैं सब पर
समभाव से
लेकिन जो अँधेरे
कोने -अंतरे हैं
उन तक कैसे पहुंचोगे
सोचा कभी !
क्यों सीमाएं
निर्धारित कर रखी हैं अपनी
कभी उन अंधे गह्वरों में भी
उतर कर देखो
एक रहस्यमयी दुनिया को
आलोकित करने का सुख
तुम भी तो देखो
कैसा होता है ..................विजय

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